आज एक खबर पढ़ी कि नेपाल ने हाल की भयावह बाढ़ और आपदा के लिए भारत, चीन और अमेरिका से दान नहीं, बल्कि मुआवजे (Climate Compensation) की माँग की है। नेपाल का तर्क है कि हिमालय में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के पीछे इन देशों सहित दुनिया के बड़े देशों का लगातार बढ़ता कार्बन उत्सर्जन जिम्मेदार है। इसलिए उसका खामियाजा सिर्फ नेपाल क्यों भुगते?
इस मुद्दे को मैं दो पहलुओं से देखता हूँ।
पहला पहलू—प्राकृतिक सीमाएँ और उनका लाभ-हानि।
प्रकृति ने जिस देश की भौगोलिक सीमा में जो संसाधन दिए हैं, उस पर उस देश का अधिकार है और उससे होने वाले लाभ-हानि की जिम्मेदारी भी उसी की है।
उदाहरण के लिए, अरब देशों में तेल निकलता है। वह उनकी जमीन के नीचे है, इसलिए उसका इस्तेमाल और उससे होने वाला लाभ उन्हीं का है। वे तेल बेचकर चाहे सोने के टॉयलेट सीट पर हगें या महल बनाएं, यह उनका मामला है।
वहीं हमारे यहाँ कोसी क्षेत्र है, जहाँ लगभग हर साल बाढ़ आती है और हालात ऐसे हो जाते हैं कि लोगों को पेड़ों पर चढ़कर हगना पड़ता है।
लेकिन क्या कोसी क्षेत्र के लोग हर साल किसी देश से मुआवजा माँगते हैं?
नहीं।
क्योंकि भौगोलिक स्थिति के लिए किसी दूसरे देश को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। यह प्रकृति द्वारा दी गई स्थिति है—किसी की गलती नहीं।
लेकिन अब आते हैं नेपाल की बात पर।
नेपाल का तर्क इससे अलग है।
उसका कहना है कि हिमालय में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और इसके पीछे भारत, चीन, अमेरिका सहित दुनिया के कई देशों का लगातार बढ़ता कार्बन उत्सर्जन एक बड़ा कारण है। हिमालय में रहने वाले लोग और नेपाल इस बदलाव का सीधा खामियाजा भुगत रहे हैं, इसलिए उन्हें मुआवजा मिलना चाहिए।
इस पर अलग-अलग विशेषज्ञ अलग-अलग राय दे सकते हैं।
लेकिन मेरा सवाल और मेरा समाधान थोड़ा अलग है।
क्यों न एक ऐसी वैश्विक संस्था बनाई जाए जो वैज्ञानिक आधार पर यह शोध करे कि ग्लेशियरों के पिघलने में किन-किन कारकों का कितना योगदान है?
इसके बाद हर देश पर उसके कार्बन उत्सर्जन और उसके वास्तविक जलवायु प्रभाव के अनुपात में एक निश्चित चार्ज लगाया जाए।
और उस पैसे का इस्तेमाल उन क्षेत्रों के लिए किया जाए जो जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा खामियाजा भुगत रहे हैं—खासकर हिमालयी क्षेत्रों के लोगों के पुनर्वास, पर्यावरण संरक्षण, ग्लेशियर संरक्षण और नदियों को बचाने में।
साथ ही, उसी व्यवस्था के तहत दुनिया के सभी देशों पर कार्बन उत्सर्जन कम करने की बाध्यता हो।
क्योंकि ग्लेशियर का पिघलना अपने आप में बहुत बड़ी चेतावनी है।
मानव जीवन का अस्तित्व नदियों पर निर्भर है। हम चाहे कितनी भी तकनीक विकसित कर लें, लेकिन अगर नदियाँ ही जीवित नहीं बचीं तो मानव जीवन का बचना मुश्किल होगा।
इसलिए अगर हमें नदियों को बचाना है तो हमें ग्लेशियरों को बचाना होगा।
और अगर ग्लेशियर इसी तरह तेजी से पिघलते रहे, तो आने वाले वर्षों में हिमालय और उससे निकलने वाली नदियों का भविष्य कितना भयावह होगा, इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। हिमालय को हमने सिर्फ पहाड़ समझ लिया है, जबकि वास्तव में वह करोड़ों लोगों के पानी और जीवन का आधार है।
इसलिए यह सिर्फ नेपाल की समस्या नहीं है।
यह भारत की भी समस्या है।
यह चीन की भी समस्या है।
यह अमेरिका की भी समस्या है।
यह एशिया की समस्या है।
और अंततः पूरी मानवता की समस्या है।
इसका समाधान सिर्फ एक-दूसरे पर आरोप लगाने या मुआवजा देने से नहीं होगा। हमें अपनी जीवनशैली और नीतियों में भी बदलाव करना होगा।
जो लोग पहाड़ों में सिर्फ घूमने के लिए 4×4 SUV लेकर जाते हैं, उन्हें सोचना होगा कि क्या हर जगह इतनी भारी गाड़ी ले जाना जरूरी है?
पहाड़ों पर जितना संभव हो, उतना मानवीय और पर्यावरणीय दबाव कम करना होगा।
AC के इस्तेमाल पर भी गंभीर नीति बननी चाहिए।
अगर किसी ऑफिस या संस्थान में 10 AC लगाए जा रहे हैं, तो उसके परिसर में कम से कम 10 बड़े, छायादार पेड़ होना अनिवार्य क्यों नहीं होना चाहिए?
यानी जितना हम प्रकृति से लेते हैं, उतना ही वापस देने की जिम्मेदारी भी हमारी होनी चाहिए।
ऐसे ही कई नियम बनाए जा सकते हैं।
क्योंकि अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि नेपाल को मुआवजा मिलेगा या नहीं।
सवाल यह है कि—
अगर हिमालय कमजोर हुआ तो नदियों का क्या होगा?
अगर नदियाँ कमजोर हुईं तो करोड़ों लोगों का क्या होगा?
और अगर पानी ही नहीं बचा, तो हमारी सारी तकनीक, अर्थव्यवस्था और विकास किस काम आएगा?
इसलिए नेपाल की माँग को सिर्फ “मुआवजा माँगने” के रूप में देखने के बजाय हमें इसे एक बड़े वैश्विक सवाल के रूप में देखना चाहिए।
हिमालय सिर्फ नेपाल का नहीं है।
हिमालय से निकलने वाली नदियाँ सिर्फ किसी एक देश की नहीं हैं।
और इन्हें बचाने की जिम्मेदारी भी सिर्फ किसी एक देश की नहीं हो सकती।
अब समय है कि दुनिया एक साथ बैठे और तय करे—
कौन कितना प्रदूषण कर रहा है,
किसका कितना योगदान है,
किसे कितना नुकसान हो रहा है,
और प्रकृति को बचाने की कीमत कौन कितना चुकाएगा।
क्योंकि अगर हमने आज हिमालय और उसके ग्लेशियरों को नहीं बचाया, तो कल हमारे पास पछताने के अलावा शायद कुछ भी नहीं बचेगा।




















































